जगदलपुर :- छत्तीसगढ़ के बस्तर में मनाया जाने वाला दशहरा देश के अन्य हिस्सों से बिल्कुल अलग है। जहां अधिकांश जगहों पर दशहरा भगवान श्रीराम की रावण पर विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, वहीं बस्तर में यह पर्व आराध्य देवी मां दंतेश्वरी को समर्पित है। यहां न रावण का पुतला जलाया जाता है और न ही उत्सव केवल एक दिन तक सीमित रहता है। बस्तर दशहरे की परंपरा करीब 75 दिनों तक चलती है, जिसमें आदिवासी संस्कृति, धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं की अनूठी झलक देखने को मिलती है। इस वर्ष यह उत्सव 27 अक्टूबर तक आयोजित किया जा रहा है।
मां दंतेश्वरी की आराधना से जुड़ा है बस्तर दशहरा
बस्तर दशहरे का सबसे बड़ा धार्मिक केंद्र मां दंतेश्वरी हैं, जिन्हें बस्तर अंचल की आराध्य देवी और मां दुर्गा का स्वरूप माना जाता है। स्थानीय लोगों की मान्यता के अनुसार, मां दंतेश्वरी क्षेत्र की कुलदेवी हैं। धार्मिक कथाओं के मुताबिक, माता सती का दांत इस स्थान पर गिरा था, जिसके कारण देवी का नाम दंतेश्वरी पड़ा। दंतेवाड़ा में शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम के पास स्थित मां दंतेश्वरी का प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। दशहरे के दौरान देवी की पूजा-अर्चना और विभिन्न पारंपरिक अनुष्ठानों के माध्यम से सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
विशाल रथ और आदिवासी परंपराएं हैं उत्सव की खास पहचान
बस्तर दशहरे का सबसे आकर्षक दृश्य लकड़ी से बने विशाल रथ का होता है। लगभग 40 फुट ऊंचे इस रथ को पारंपरिक औजारों की मदद से कारीगर तैयार करते हैं। रथ निर्माण से लेकर उसे खींचने तक में अलग-अलग गांवों और समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इसकी रस्सियों को थामकर श्रद्धालु पूरे उत्साह के साथ रथ खींचते हैं। परंपरा के अनुसार, रथ खींचने का विशेष अधिकार किलेपाल परगना के माड़िया आदिवासियों को प्राप्त है। यह आयोजन बस्तर की सामुदायिक एकता और समृद्ध आदिवासी विरासत को दर्शाता है।
करीब 600 साल पुरानी है रथ परंपरा
बस्तर दशहरे की शुरुआत को लेकर प्रचलित ऐतिहासिक मान्यता इसे लगभग 600 साल पुराना बताती है। कहा जाता है कि बस्तर के राजा पुरुषोत्तम देव जगन्नाथ पुरी की यात्रा पर गए थे। इस दौरान पुरी के राजा ने उन्हें 16 पहियों वाला रथ भेंट किया था। इसी कथा को बस्तर दशहरे की रथ परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। उत्सव के दौरान जोगी की साधना सहित कई अनूठी रस्में निभाई जाती हैं। नौ दिनों तक गड्ढे में बैठकर साधना करने वाले जोगियों की परंपरा भी इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
काचन गादी से भीतर रैनी तक निभाई जाती हैं विशेष रस्में
बस्तर दशहरे में हर दिन अलग-अलग धार्मिक और पारंपरिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। काचन गादी की रस्म में काचन और रैला माता की पूजा कर उत्सव के सफल आयोजन की कामना की जाती है। एक अन्य परंपरा में छोटी बच्ची को देवी का स्वरूप मानकर उससे अनुमति लेने के बाद उत्सव से जुड़ी रस्मों को आगे बढ़ाया जाता है। विजयादशमी पर विजय रथ निकाला जाता है, जबकि भीतर रैनी के दौरान रथ को जंगल में छिपाने की परंपरा निभाई जाती है। इन रस्मों में बस्तर की स्थानीय मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाई देती है।
धार्मिक आस्था के साथ बस्तर की संस्कृति का प्रतीक है दशहरा
बस्तर दशहरा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि यहां की आदिवासी संस्कृति, लोक परंपराओं और सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। इस पर्व में विभिन्न समुदाय अपनी परंपराओं के साथ भागीदारी निभाते हैं। मां दंतेश्वरी के प्रति श्रद्धा, विशाल रथ की परिक्रमा और सदियों से चली आ रही रस्में इसे देश के सबसे विशिष्ट दशहरा उत्सवों में शामिल करती हैं। करीब 75 दिनों तक चलने वाला यह आयोजन बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए रखता है और देश-दुनिया के लोगों को यहां की अनूठी परंपराओं से परिचित कराता है।


