हिंदू धर्म में अहोई अष्टमी का व्रत संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना के लिए रखा जाता है। इस दिन माताएं अहोई माता की पूजा-अर्चना करती हैं और अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई माता को देवी पार्वती का स्वरूप माना जाता है। इस साल अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर 2026, रविवार को मनाए जाने की जानकारी दी जा रही है।

अहोई अष्टमी का क्या है धार्मिक महत्व?

हिंदू पंचांग के अनुसार, अहोई अष्टमी कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। यह पर्व दीपावली से कुछ दिन पहले आता है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखी जीवन की कामना करते हुए व्रत रखती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं दिनभर निर्जला उपवास करती हैं और शाम को अहोई माता की पूजा के बाद तारों को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करती हैं। हालांकि, व्रत की परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में भिन्न हो सकती हैं।

अहोई अष्टमी व्रत की पौराणिक कथा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई अष्टमी की कथा एक महिला से जुड़ी है, जो जंगल में मिट्टी खोदने गई थी। इस दौरान अनजाने में उससे साही के एक बच्चे की मृत्यु हो गई। इसके बाद महिला को अपने बच्चों से जुड़ी दुखद घटनाओं का सामना करना पड़ा। अपनी भूल का प्रायश्चित करने और संतान की रक्षा की कामना से उसने अहोई माता की आराधना की। मान्यता है कि तभी से माताएं अपनी संतान की खुशहाली के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं। यह कथा धार्मिक लोकपरंपरा का हिस्सा है।

अहोई अष्टमी की पूजा विधि

अहोई अष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद संतान की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हुए व्रत का संकल्प लें। परंपरा के अनुसार, महिलाएं दिनभर उपवास रखती हैं और शाम के समय अहोई माता की पूजा करती हैं। पूजा के लिए दीवार पर अहोई माता की तस्वीर या चित्र बनाया जाता है। कई परिवारों में साही और उसके बच्चों का चित्र भी बनाया जाता है। इसके बाद माता को रोली, चावल, फूल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर व्रत कथा पढ़ी या सुनी जाती है।

तारों को अर्घ्य देकर किया जाता है व्रत का पारण

अहोई अष्टमी की पूजा में तारों का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता के अनुसार, शाम को पूजा-अर्चना के बाद तारों को जल अर्पित किया जाता है और संतान की सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। इसके बाद व्रत का पारण किया जाता है। करवा चौथ की तरह इस व्रत में चंद्रमा के दर्शन की जगह तारों को अर्घ्य देने की परंपरा प्रचलित है। कुछ परिवारों में पूजा और पारण की विधि अलग भी हो सकती है।

अहोई अष्टमी पर किन बातों का रखें ध्यान?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पूजा-पाठ के दौरान शुद्धता और सात्विकता का ध्यान रखना चाहिए। कई परिवारों में चाकू, कैंची और सुई जैसी धारदार वस्तुओं के इस्तेमाल से बचने की परंपरा है। इसी तरह मिट्टी खोदने, बाल धोने या काटने और दिन में सोने से परहेज करने की मान्यता भी कुछ क्षेत्रों में प्रचलित है। हालांकि, ये परंपरागत मान्यताएं हैं और सभी जगह इनके नियम एक जैसे नहीं हैं।

व्रत के दौरान रखें सात्विकता का ध्यान

अहोई अष्टमी के दिन शांत मन से पूजा-अर्चना करना, किसी से विवाद न करना और जरूरतमंदों की सहायता करना शुभ माना जाता है। कई परिवारों में ब्राह्मणों को भोजन कराने और जरूरतमंदों को दान देने की परंपरा भी है। व्रत के पारण के समय सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है। यदि कोई महिला स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के कारण निर्जला व्रत नहीं रख सकती, तो अपनी सेहत को ध्यान में रखते हुए उपवास की उपयुक्त विधि अपनाना बेहतर है।