नई दिल्ली :- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाने जा रहा है। इसरो आज भारत की दूसरी पीढ़ी के नेविगेशन सैटेलाइट सीरीज के तीसरे उपग्रह NVS-03 को लॉन्च करने की तैयारी में है। इस मिशन के लिए GSLV-F18 रॉकेट का इस्तेमाल किया जाएगा, जो श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से उड़ान भरेगा।
इस मिशन का मुख्य उद्देश्य भारत के स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम NavIC को और अधिक मजबूत बनाना है। NVS-03 में स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक और आधुनिक नेविगेशन तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इससे भारत की रक्षा, परिवहन, समुद्री नौवहन और आम नागरिकों के लिए लोकेशन सेवाओं को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
क्या है NavIC और भारत के लिए क्यों है जरूरी?
NavIC का पूरा नाम Navigation with Indian Constellation है। इसे भारत का स्वदेशी GPS भी कहा जाता है। यह प्रणाली भारत और उसके आसपास लगभग 1,500 किलोमीटर के क्षेत्र में सटीक लोकेशन, नेविगेशन और समय संबंधी सेवाएं उपलब्ध कराती है।
NavIC की शुरुआत के पीछे 1999 का करगिल युद्ध एक महत्वपूर्ण वजह रहा। उस समय भारत को महसूस हुआ कि सैन्य और रणनीतिक जरूरतों के लिए विदेशी नेविगेशन प्रणालियों पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। इसके बाद भारत ने अपनी स्वतंत्र नेविगेशन प्रणाली विकसित करने की दिशा में काम शुरू किया।
आज NavIC का महत्व केवल सेना तक सीमित नहीं है। इसका इस्तेमाल परिवहन, समुद्री नौवहन, विमानन, आपदा प्रबंधन और आम नागरिकों की लोकेशन आधारित सेवाओं में भी किया जा सकता है।
NVS-03 सैटेलाइट की 5 बड़ी खासियतें
1. स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक से मिलेगी सटीक टाइमिंग
NVS-03 की सबसे बड़ी खासियत इसमें लगाई गई स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक है। नेविगेशन सिस्टम में समय की सटीकता बेहद महत्वपूर्ण होती है। समय की थोड़ी सी भी गड़बड़ी लोकेशन की गणना को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में स्वदेशी तकनीक से बनी एटॉमिक क्लॉक भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता को नई मजबूती देगी।
2. नया L1 सिग्नल आम लोगों के लिए होगा उपयोगी
NVS-03 में मौजूदा L5 और S-बैंड सिग्नल के अलावा नया L1 सिग्नल भी शामिल किया गया है। L1 सिग्नल का इस्तेमाल दुनिया भर में स्मार्टफोन, स्मार्टवॉच और कई नेविगेशन डिवाइस में किया जाता है। इससे NavIC के साथ आम नागरिकों के उपकरणों की अनुकूलता बढ़ने की उम्मीद है।
3. लगभग 1,500 किलोमीटर तक मिलेगा कवरेज
NavIC भारत की मुख्य भूमि के साथ उसके आसपास लगभग 1,500 किलोमीटर तक के क्षेत्र में सेवाएं प्रदान करता है। इसमें हिंद महासागर का क्षेत्र भी शामिल है। इससे समुद्री जहाजों की आवाजाही, विमानन और आपदा प्रबंधन जैसी गतिविधियों में मदद मिलेगी।
4. रक्षा और सामरिक जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण
भारत का अपना स्वतंत्र नेविगेशन सिस्टम होना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। NavIC के माध्यम से देश को लोकेशन और टाइमिंग सेवाओं के लिए विदेशी प्रणालियों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती है। इसका इस्तेमाल रक्षा और सामरिक गतिविधियों में भी किया जा सकता है।
5. दूसरी पीढ़ी के नेविगेशन नेटवर्क को मिलेगी मजबूती
NVS-03 दूसरी पीढ़ी के NavIC सैटेलाइट सिस्टम का तीसरा उपग्रह है। इससे पहले NVS-01 को मई 2023 में और NVS-02 को जनवरी 2025 में लॉन्च किया गया था। NVS-03 के बाद NVS-04 और NVS-05 जैसे उपग्रह भी इस नेटवर्क को मजबूत करने की योजना का हिस्सा हैं।
'नॉटी ब्वॉय' से 'स्मार्ट ब्वॉय' तक GSLV का सफर
NVS-03 को लॉन्च करने के लिए GSLV-F18 रॉकेट का इस्तेमाल किया जाएगा। यह GSLV कार्यक्रम की 20वीं उड़ान है। करीब 50 मीटर लंबा और लगभग 420 टन वजन वाला यह तीन चरणों का रॉकेट है। शुरुआती दौर में क्रायोजेनिक इंजन तकनीक से जुड़ी चुनौतियों और असफलताओं के कारण GSLV को अनौपचारिक रूप से 'नॉटी ब्वॉय' कहा जाता था। हालांकि, इसरो के वैज्ञानिकों की लगातार मेहनत और तकनीकी सुधारों के बाद इस रॉकेट ने अपनी विश्वसनीयता साबित की है। GSLV-F18 का काम NVS-03 को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित करना है। इसके बाद उपग्रह को निर्धारित अंतिम कक्षा तक पहुंचाने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम
NVS-03 का प्रक्षेपण भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक, नए L1 सिग्नल और आधुनिक नेविगेशन तकनीक से NavIC नेटवर्क को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी। कुल मिलाकर, यह मिशन भारत को अपनी स्वतंत्र नेविगेशन व्यवस्था मजबूत करने की दिशा में आगे ले जाएगा। इससे आम नागरिकों को बेहतर लोकेशन सेवाएं मिलने के साथ रक्षा, परिवहन, समुद्री गतिविधियों और आपदा प्रबंधन के क्षेत्रों में भी देश की क्षमताएं बढ़ेंगी।


