बिलासपुर :- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तलाक के बाद शैक्षणिक दस्तावेजों में अपना मूल नाम दोबारा दर्ज कराने की मांग करने वाली महिला के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वैवाहिक स्थिति बदलने या तलाक होने के बाद कोई महिला अपनी शैक्षणिक डिग्रियों में पुराना नाम दर्ज कराना चाहती है, तो शैक्षणिक संस्थान केवल नियमों का हवाला देकर उसे मना नहीं कर सकते। जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने बिलासपुर के शासकीय बिलासा कन्या महाविद्यालय के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें महिला के शैक्षणिक रिकॉर्ड में नाम संशोधन के आवेदन को निरस्त कर दिया गया था। कोर्ट ने कॉलेज प्रबंधन को जरूरी औपचारिकताएं पूरी कराकर महिला के मूल नाम से संशोधित डिग्रियां जारी करने के निर्देश दिए हैं।
शादी के बाद बदल गया था नाम, तलाक के बाद पुराने नाम की मांग
दरअसल, यह मामला बिलासपुर निवासी सुरभि यादव से जुड़ा है। सुरभि ने अपनी स्कूली शिक्षा मूल नाम से पूरी की थी। साल 2012 में राजिक अहमद अंसारी से शादी के बाद उनका नाम बदलकर सुहाना अंसारी हो गया। इसके बाद उन्होंने बिलासा कन्या महाविद्यालय से बीएससी और एमएससी सहित अन्य डिप्लोमा की पढ़ाई पूरी की। उनकी सभी शैक्षणिक डिग्रियां सुहाना अंसारी नाम से जारी की गईं। हालांकि, साल 2022 में फैमिली कोर्ट ने उनकी शादी को कानूनी रूप से निरस्त कर दिया। इसके बाद उन्होंने आधार कार्ड, जाति प्रमाण पत्र और निवास प्रमाण पत्र सहित अन्य सरकारी दस्तावेजों में अपना मूल नाम सुरभि यादव दोबारा दर्ज करा लिया।
डिग्रियों में नाम अलग होने से सरकारी नौकरी में आई परेशानी
सरकारी दस्तावेजों में मूल नाम वापस दर्ज होने के बावजूद उनकी शैक्षणिक डिग्रियों में सुहाना अंसारी नाम ही बना रहा। इस वजह से उन्हें सरकारी नौकरी के आवेदन भरने और दस्तावेजों के सत्यापन के दौरान परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था। उन्होंने कॉलेज प्रबंधन और विश्वविद्यालय से अपनी डिग्रियों में नाम संशोधित करने की मांग की, लेकिन उनका आवेदन खारिज कर दिया गया। पहले हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद भी कॉलेज की शासी निकाय ने नाम सुधारने से इनकार कर दिया। इसके बाद महिला को दोबारा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
हाईकोर्ट ने कहा- केवल नियमों का हवाला देकर नहीं कर सकते इनकार
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों की जिम्मेदारी अपने रिकॉर्ड की प्रमाणिकता बनाए रखना है, लेकिन किसी व्यक्ति की कानूनी स्थिति में बदलाव होने पर रिकॉर्ड में संशोधन की गुंजाइश भी होनी चाहिए।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर नाम बदलने का आवेदन खारिज नहीं किया जा सकता कि परीक्षा परिणाम जारी होने के बाद संशोधन के लिए कोई स्पष्ट नियम मौजूद नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि नाम में बदलाव से महिला की शैक्षणिक योग्यता, श्रेणी, अंक या पढ़ाई के वर्षों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसलिए केवल प्रक्रियागत नियमों के आधार पर उन्हें उनके मूल नाम से डिग्री जारी करने से वंचित नहीं किया जा सकता।
कॉलेज को 6 सप्ताह में जारी करनी होगी संशोधित डिग्री
हाईकोर्ट ने शासकीय बिलासा कन्या महाविद्यालय प्रबंधन को निर्देश दिया है कि आवश्यक शपथ पत्र, निर्धारित फीस और राजपत्र (गजट) प्रकाशन जैसी औपचारिकताएं पूरी कराकर सुरभि यादव के मूल नाम से संशोधित डिग्रियां जारी की जाएं। इसके साथ ही अटल विश्वविद्यालय को भी इस प्रक्रिया में पूरा सहयोग करने के निर्देश दिए गए हैं। कोर्ट ने आदेश की प्रति प्राप्त होने के छह सप्ताह के भीतर पूरी कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है। हाईकोर्ट का यह फैसला उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिन्हें शादी के बाद बदले हुए नाम और तलाक के बाद पुराने नाम की वापसी के कारण शैक्षणिक दस्तावेजों में विसंगति का सामना करना पड़ता है।


