नई दिल्ली :- अमेरिकी फेडरल रिजर्व के हालिया फैसले के बाद भारत में भी ब्याज दरों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। 16 सितंबर 2026 को फेड ने नीतिगत ब्याज दर में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी करते हुए इसे 3.75% से 4% के दायरे में कर दिया। फेड के नए अनुमानों में 2026 की महंगाई का अनुमान 3.7% और साल के अंत में फेडरल फंड्स रेट का मध्य अनुमान 4.1% रखा गया है।
अमेरिकी ब्याज दरों के ऊंचे स्तर का असर भारत पर पूंजी प्रवाह और रुपये के जरिए पड़ सकता है। डॉलर आधारित परिसंपत्तियों का आकर्षण बढ़ने से उभरते बाजारों पर दबाव बन सकता है। भारत में भी रुपये पर दबाव देखने को मिला और 18 सितंबर को रुपया करीब 95.88 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ। वैश्विक ब्याज दरों और कच्चे तेल की कीमतों की दिशा आगे भी महत्वपूर्ण रहेगी।
घरेलू मोर्चे पर भी महंगाई के आंकड़े रिजर्व बैंक के लिए चुनौती पेश कर रहे हैं। अगस्त 2026 में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.82% हो गई, जबकि जुलाई में यह 4.45% थी। इसी दौरान खाद्य महंगाई 5.95% तक पहुंच गई। कोर महंगाई भी करीब 4.2% रहने का अनुमान है, जिससे कीमतों पर दबाव के अलग-अलग पहलुओं पर नजर रखना जरूरी हो गया है।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारत के लिए एक और जोखिम है। तेल की ऊंची कीमतों से आयात बिल बढ़ने के साथ रुपये पर दबाव पड़ सकता है और इसका असर घरेलू महंगाई पर भी हो सकता है। दूसरी ओर, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी से शेयर बाजार और मुद्रा बाजार पर दबाव की स्थिति बन सकती है।
अब बाजार की नजर रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की अगली बैठक पर है, जो 5 से 7 अक्टूबर 2026 को प्रस्तावित है। हालांकि फेड के फैसले के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि आरबीआई ब्याज दर में बढ़ोतरी करेगा। केंद्रीय बैंक के फैसले में घरेलू महंगाई, आर्थिक विकास, रुपये की स्थिति, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों के साथ-साथ मौद्रिक नीति के आगे के रुख के संकेत भी अहम होंगे।


