रायपुर :- आज होगा श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह महोत्सव, श्रीमद् भागवत कथा के क्रम में भगवान श्रीकृष्ण एवं माता रुक्मिणी के दिव्य विवाह महोत्सव का आयोजन होगा। प्रेम, भक्ति और समर्पण के पावन प्रतीक श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह की मंगलमयी कथा का रसपान श्रद्धालु परम पूज्य श्री इन्द्रेश महाराज जी के श्रीमुख से करेंगे। विवाह महोत्सव को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है। कथा स्थल पर भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी के विवाह प्रसंग को भक्तिमय वातावरण में प्रस्तुत किया जाएगा।
कल की कथा में भागवताचार्य इन्द्रेश महाराज जी ने भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन धारण लीला का वर्णन करते हुए कहा कि श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत धारण कर इंद्र के अभिमान का मर्दन किया था। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने सामर्थ्य और उपलब्धियों का कभी अभिमान नहीं करना चाहिए। रायपुर में पिछले ढाई दिनों से हो रही लगातार बारिश के बावजूद मंडी ग्राउंड, देवेन्द्रनगर में हजारों श्रद्धालु कथा श्रवण के लिए पहुंचे। पंडाल गीला होने और कुछ स्थानों पर पानी भरने के बावजूद भक्तों की आस्था पर कोई असर नहीं पड़ा। महाराज जी ने श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सूर्य के दर्शन भले नहीं हो रहे, लेकिन ठाकुर जी श्यामसुंदर बनकर भक्तों के बीच आए हैं और बारिश के बीच भी कथा का क्रम नहीं रुका।
आगे महराज ने बताया की कलयुग में बाहरी सुंदरता और दिखावे के बजाय मन, बुद्धि और विचारों की सुंदरता को महत्व देने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भगवान व्यक्ति के बाहरी रंग-रूप को नहीं, बल्कि उसके भाव और आचरण को देखते हैं। मनुष्य को ऐसा आचरण करना चाहिए कि ठाकुर जी की दृष्टि सदैव उस पर बनी रहे। उन्होंने सच्चे प्रेम और भक्ति का उदाहरण गोपियों के जीवन से लेने की बात कही और कहा कि परिस्थितियां कैसी भी हों, भगवान के प्रति समर्पण और निष्ठा बनी रहनी चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए महाराज जी ने पूतना प्रसंग भी सुनाया। उन्होंने कहा कि जब ठाकुर जी पूतना जैसी राक्षसी को भी सुख प्रदान कर सकते हैं, तो मनुष्य को स्वयं को भगवान की कृपा के अयोग्य नहीं समझना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से जप, नियम, व्रत, अनुष्ठान और कथा श्रवण के साथ भगवान के प्रति विश्वास और समर्पण का भाव रखने का आह्वान किया।
मोक्ष की व्याख्या करते हुए इन्द्रेश महाराज ने कहा कि संसार में रहते हुए माया के बंधनों में न बंधना ही मोक्ष है। जो व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेता है और सांसारिक बंधनों से विचलित नहीं होता, वही वास्तविक स्वतंत्रता की ओर बढ़ता है। उन्होंने आत्मज्ञान को भी मोक्ष का महत्वपूर्ण मार्ग बताया। इस दौरान जगन्नाथपुरी से मंगाए गए महाप्रसाद खाजा और निर्माल्य चावल का श्रद्धालुओं के बीच वितरण किया गया। महाप्रसाद वितरण की व्यवस्था कथा के प्रमुख सेवादारी गुंजन प्रजापति के नेतृत्व में की गई।


