नई दिल्ली :- भारत अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) भविष्य की पीढ़ी के शक्तिशाली रॉकेट विकसित करने के लिए मीथेन आधारित इंजन तकनीक पर काम कर रहा है। इसी कड़ी में 9 अक्टूबर 2026 को तमिलनाडु के महेंद्रगिरि स्थित इसरो प्रोपल्शन कॉम्प्लेक्स में 1,100 किलोन्यूटन क्षमता वाले LME-1100 इंजन के गैस जनरेटर का पहला इग्निशन टेस्ट किया गया। इस तकनीक के सफल विकास से भारत की भारी पेलोड अंतरिक्ष में पहुंचाने की क्षमता को मजबूती मिल सकती है।

इसरो ने 2,400 किलोन्यूटन क्षमता वाले एक अन्य लिक्विड ऑक्सीजन-मीथेन इंजन का डिजाइन भी पूरा कर लिया है। इस इंजन में फुल-फ्लो स्टेज्ड कंबशन साइकिल तकनीक का इस्तेमाल प्रस्तावित है, जो अमेरिकी कंपनी SpaceX के स्टारशिप रॉकेट में उपयोग होने वाले रैप्टर इंजन की तकनीक से मिलती-जुलती है। यह तकनीक ईंधन और ऑक्सीजन के अधिक प्रभावी इस्तेमाल में मदद कर सकती है। हालांकि, दोनों इंजन अलग-अलग डिजाइन और दहन प्रणालियों पर आधारित हैं।

मीथेन को भविष्य के रॉकेटों के लिए एक महत्वपूर्ण ईंधन माना जा रहा है। लिक्विड मीथेन और लिक्विड ऑक्सीजन का संयोजन रॉकेट इंजन के प्रदर्शन को बेहतर बनाने और पुनः इस्तेमाल किए जाने वाले लॉन्च व्हीकल विकसित करने में मदद कर सकता है। इसके अलावा, मीथेन आधारित प्रणोदन प्रणाली में कालिख और कार्बन जमाव की समस्या अपेक्षाकृत कम हो सकती है, जिससे इंजन के रखरखाव में फायदा मिलने की संभावना है। यही वजह है कि दुनिया की प्रमुख अंतरिक्ष एजेंसियां और कंपनियां इस तकनीक पर काम कर रही हैं।

भारत में मीथेन प्रोपल्शन तकनीक पर काम वर्ष 2019 में शुरू हुआ था। शुरुआती टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर के परीक्षणों से मिले अनुभव के आधार पर LME-1100 परियोजना को 2023 में शुरू किया गया। इस इंजन के 70 प्रतिशत से अधिक पुर्जे एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग यानी 3D प्रिंटिंग तकनीक से भारतीय औद्योगिक साझेदारों की मदद से तैयार किए गए हैं। फिलहाल इसके टर्बोपंप, इग्नाइटर, गैस जनरेटर और थ्रस्ट चैंबर जैसे अहम हिस्सों का विकास और परीक्षण किया जा रहा है। पूरा इंजन 2027 के मध्य तक तैयार होने की उम्मीद है, जिसके बाद इसके हॉट-फायर क्वालिफिकेशन टेस्ट किए जाएंगे।

इसरो की यह पहल भारत के नेक्स्ट जनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) और भविष्य के हैवी-लिफ्ट रॉकेट कार्यक्रमों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इन तकनीकों से भारत के महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष अभियानों, विशेषकर भविष्य में चंद्रमा पर मानव को उतारने की योजना, को मदद मिल सकती है। हालांकि, अभी पूरे इंजन के एकीकृत परीक्षण और योग्यता परीक्षण बाकी हैं। ऐसे में यह तकनीकी उपलब्धि भविष्य की दिशा में एक अहम कदम है, लेकिन इसे परिचालन में लाने से पहले कई चरण पूरे करने होंगे।