रायपुर :- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) देश के प्रमुख सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों में शामिल है। इसकी स्थापना 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन महाराष्ट्र के नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और देश में स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था। डॉ. हेडगेवार का मानना था कि देश और समाज को मजबूत बनाने के लिए लोगों में एकता, अनुशासन, संगठन की भावना और राष्ट्रीय चेतना विकसित करना जरूरी है। इसी विचार के साथ उन्होंने संघ की शुरुआत की। आज RSS की पहचान उसकी शाखाओं, स्वयंसेवकों और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के कारण देशभर में है।

RSS की स्थापना कब और किसने की?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 27 सितंबर 1925 को नागपुर में की थी। उन्हें संघ के स्वयंसेवक ‘डॉक्टरजी’ के नाम से भी संबोधित करते हैं। उनका जन्म 1 अप्रैल 1889 को नागपुर में हुआ था। उन्होंने चिकित्सा की पढ़ाई की और युवावस्था से ही राष्ट्रीय गतिविधियों तथा स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे। उनके जीवन पर उस समय के राजनीतिक और सामाजिक घटनाक्रम का प्रभाव पड़ा। संघ की आधिकारिक ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार, स्थापना के समय इसका उद्देश्य लोगों को शारीरिक, बौद्धिक और सामाजिक रूप से संगठित करना था। शुरुआत में संगठन का काम नागपुर में सीमित संख्या में लोगों के साथ शुरू हुआ, लेकिन आगे चलकर इसका विस्तार देश के अलग-अलग हिस्सों में हुआ।

RSS बनाने की जरूरत क्यों महसूस हुई?

RSS की स्थापना के पीछे तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उस दौर में भारत ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन से गुजर रहा था। विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएं और सामाजिक संगठन देश के भविष्य को लेकर सक्रिय थे। डॉ. हेडगेवार ने समाज में एकजुटता और सामूहिक अनुशासन की कमी को एक बड़ी चुनौती माना। संघ की आधिकारिक व्याख्या के अनुसार, उनका विचार था कि हिंदू समाज को संगठित करके उसमें सामाजिक जिम्मेदारी, आत्मविश्वास और राष्ट्रीय चेतना विकसित की जानी चाहिए। संघ की स्थापना केवल नियमित बैठकें आयोजित करने के लिए नहीं की गई थी, बल्कि इसके माध्यम से स्वयंसेवकों के व्यक्तित्व निर्माण और संगठनात्मक क्षमता पर भी जोर दिया गया। संघ की सोच में दैनिक अभ्यास, सामूहिक गतिविधियां और वैचारिक चर्चा को विशेष स्थान मिला। हालांकि, RSS की स्थापना को समझने के लिए उस समय की परिस्थितियों के साथ-साथ संस्थापक की विचारधारा और संगठन के घोषित उद्देश्यों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

कैसे शुरू हुई RSS की शाखा व्यवस्था?

संघ की शुरुआती गतिविधियों में शारीरिक प्रशिक्षण, अनुशासन, सामूहिक अभ्यास और राष्ट्रीय विषयों पर चर्चा शामिल थी। स्थापना के बाद नियमित शाखा व्यवस्था विकसित की गई, जिसके माध्यम से स्वयंसेवक एक निश्चित स्थान पर एकत्र होकर विभिन्न गतिविधियों में हिस्सा लेते थे। RSS की आधिकारिक समयरेखा के अनुसार, 17 अप्रैल 1926 को संगठन का नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तय किया गया। इसके बाद 28 मई 1926 को नागपुर के मोहिते वाड़ा मैदान में नियमित दैनिक शाखा की शुरुआत हुई। शाखाओं में शारीरिक अभ्यास, खेल, अनुशासन और बौद्धिक चर्चा को महत्व दिया गया। इन गतिविधियों का उद्देश्य स्वयंसेवकों में सामूहिकता, नेतृत्व और संगठन के प्रति जिम्मेदारी विकसित करना बताया गया। शुरुआती वर्षों में संघ ने नागपुर और आसपास के क्षेत्रों में अपना काम बढ़ाया। समय के साथ दूसरे शहरों और राज्यों में भी शाखाएं शुरू हुईं। इस तरह शाखा व्यवस्था संघ की संगठनात्मक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।

RSS के प्रमुख उद्देश्य क्या हैं?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने घोषित उद्देश्यों में समाज को संगठित करना, सांस्कृतिक चेतना को बढ़ावा देना, अनुशासन विकसित करना और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना मजबूत करना शामिल करता है। संघ की गतिविधियों में शाखाएं, स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण, सामाजिक संपर्क और विभिन्न सेवा कार्य शामिल हैं। संगठन का कहना है कि समाज के लोगों को साथ लेकर चलना और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से सामाजिक जीवन को मजबूत बनाना उसके कार्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संघ से प्रेरित कई संगठन भी समय के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय हुए हैं। इनमें शिक्षा, श्रमिक गतिविधियों, सामाजिक सेवा और छात्र संगठनों से जुड़े समूह शामिल हैं। इन संगठनों की अपनी अलग संरचना और गतिविधियां हैं, इसलिए उन्हें सीधे RSS की शाखा मानने के बजाय संघ से प्रेरित संगठनों के रूप में समझना अधिक उचित है। RSS की विचारधारा और उससे जुड़े संगठनों की भूमिका को लेकर भारतीय समाज में अलग-अलग विचार भी मौजूद हैं।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में RSS की भूमिका

RSS की स्थापना ऐसे समय में हुई जब देश के विभिन्न हिस्सों में ब्रिटिश शासन से आजादी के लिए आंदोलन चल रहे थे। डॉ. हेडगेवार स्वयं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे थे। हालांकि, संघ की संगठनात्मक गतिविधियों और स्वतंत्रता आंदोलन के व्यापक राजनीतिक अभियानों के बीच अंतर को समझना जरूरी है। संघ ने अपनी शुरुआती कार्यपद्धति में दैनिक शाखाओं, संगठन निर्माण और स्वयंसेवकों के प्रशिक्षण पर जोर दिया। डॉ. हेडगेवार ने 1930 में जंगल सत्याग्रह में भी भाग लिया था और उन्हें जेल जाना पड़ा था। संघ के इतिहास में उनके व्यक्तिगत राजनीतिक योगदान और संगठन के रूप में RSS की गतिविधियों को अलग-अलग संदर्भों में देखा जाता है। स्वतंत्रता आंदोलन में विभिन्न संगठनों, नेताओं और विचारधाराओं की भूमिका पर इतिहासकारों के बीच चर्चा होती रही है। इसलिए इस विषय को समझते समय व्यक्तिगत भागीदारी, संगठन की आधिकारिक नीति और ऐतिहासिक घटनाओं के बीच अंतर करना महत्वपूर्ण है।

आज के समय में RSS की भूमिका क्या है?

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश के अनेक हिस्सों में शाखाओं और स्वयंसेवकों के माध्यम से काम करता है। इसकी गतिविधियों में संगठनात्मक प्रशिक्षण, सामाजिक संपर्क, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सेवा कार्य शामिल हैं। संघ से जुड़े विभिन्न संगठन शिक्षा, सामाजिक सेवा, श्रमिक हितों और अन्य क्षेत्रों में भी सक्रिय हैं। इसके प्रभाव और विचारधारा पर राजनीतिक, सामाजिक तथा अकादमिक स्तर पर चर्चा होती रही है। RSS के समर्थक इसे सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक संगठन और सेवा गतिविधियों से जोड़कर देखते हैं। दूसरी ओर, आलोचक इसकी विचारधारा, राष्ट्रवाद की अवधारणा और भारतीय समाज पर इसके प्रभाव को लेकर सवाल उठाते हैं। भारतीय लोकतंत्र में किसी भी बड़े संगठन को समझने के लिए उसके घोषित उद्देश्यों के साथ-साथ उसकी गतिविधियों, सार्वजनिक बयानों और सामाजिक प्रभाव का तथ्यात्मक अध्ययन जरूरी है।