हिंदू धर्म में करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए व्रत रखती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महिलाएं सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत करती हैं और रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलती हैं। करवा चौथ के दिन पूजा-पाठ के साथ कुछ पारंपरिक नियमों का पालन भी किया जाता है। ऐसे में व्रत रखने से पहले इसकी तिथि, पूजा के मुहूर्त और जरूरी परंपराओं के बारे में जानना महत्वपूर्ण है।

करवा चौथ 2026 कब है और क्या है पूजा का शुभ मुहूर्त?

पंचांग के अनुसार, करवा चौथ कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। आपके दिए गए विवरण के मुताबिक, इस वर्ष करवा चौथ की तिथि 29 अक्टूबर 2026 बताई गई है। पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 54 मिनट से 7 बजकर 10 मिनट तक और चंद्रोदय रात 8 बजकर 39 मिनट पर बताया गया है। हालांकि, व्रत की सही तिथि और मुहूर्त की पुष्टि स्थानीय पंचांग से जरूर कर लें, क्योंकि तिथि और चंद्रोदय के समय में स्थान के अनुसार अंतर हो सकता है।

सरगी से लेकर निर्जला व्रत तक, इन बातों का रखें ध्यान

करवा चौथ के दिन कई परिवारों में सूर्योदय से पहले सरगी खाने की परंपरा है। इसमें फल, मेवे और पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल किए जाते हैं, ताकि दिनभर ऊर्जा बनी रहे। इसके बाद महिलाएं अपनी परंपरा के अनुसार व्रत का संकल्प लेती हैं। पारंपरिक रूप से इस व्रत में अन्न और जल ग्रहण नहीं किया जाता, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। गर्भवती महिलाओं, मधुमेह से पीड़ित महिलाओं या नियमित दवाएं लेने वाली महिलाओं को बिना चिकित्सकीय सलाह के निर्जला व्रत नहीं रखना चाहिए।

सोलह श्रृंगार और करवा चौथ की कथा का महत्व

करवा चौथ पर मेहंदी, सिंदूर, मंगलसूत्र, बिंदी और चूड़ियों जैसे सुहाग के प्रतीकों का विशेष महत्व माना जाता है। कई महिलाएं इस दिन सोलह श्रृंगार करती हैं और परिवार की परंपरा के अनुसार पूजा करती हैं। पूजा के दौरान करवा चौथ की कथा सुनने या पढ़ने की परंपरा भी प्रचलित है। मान्यता है कि कथा सुनने से व्रत का धार्मिक महत्व पूर्ण होता है। हालांकि, श्रृंगार के तरीके और पूजा की विधि अलग-अलग क्षेत्रों तथा परिवारों में भिन्न हो सकती है।

चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद खोलें व्रत

करवा चौथ की पूजा में चंद्रमा के दर्शन और उन्हें अर्घ्य देने का विशेष महत्व है। चंद्रोदय के बाद महिलाएं चंद्रमा की पूजा करती हैं और फिर अपने पति के हाथों जल ग्रहण करके व्रत खोलने की परंपरा निभाती हैं। पूजा के दौरान स्वच्छता, श्रद्धा और परिवार की मान्यताओं का ध्यान रखा जाता है। करवा चौथ का मूल भाव पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और आपसी सम्मान को मजबूत करना है। इसलिए धार्मिक परंपराओं के साथ अपनी सेहत का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।